मितौली क्षेत्र के ग्राम अकबरपुर में सप्त दिवसीय श्री शतचंडी महायज्ञ एवं रासलीला का भव्य आयोजन किया जा रहा है। यज्ञ कमेटी अध्यक्ष संजय यादव कोषाध्यक्ष बलवीर उपाध्यक्ष पंकज राठौर उपाध्याय दयाराम मीडिया प्रभारी सुशील द्वारा राम दरबार की सुंदर सजीव झांकी पूजन अर्चन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया । वृंदावन से पधारे कलाकारों द्वारा दिल की बेला में रामलीला की शुरुआत नारद जी के तप से शुरू हुई। लीला के पहले दिन के प्रसंग में हिमालय की गुफा में तपस्या कर रहे नारद मुनि से देवराज इन्द्र भयभीत हो उठे कि कहीं देवर्षि नारद अपने तप के बल से इंद्रपुरी को अपने अधिकार में न ले लें। इंद्र के भेजे गए कामदेव नारद की तपस्या को भंग करने में असफल रहे। तब कामदेव ने श्राप के भय से देवर्षि के चरणों में गिरकर क्षमा मांग ली। यह बात नारद ने शिवजी से कही उन्होंने हरि को बताने से मना किया। नारद ने कामदेव पर जीत की बात विष्णुजी को भी बता दी। विष्णु ने माया से सुंदर नगर रच डाला, जहां शीलनिधि राजा की पुत्री विश्वमोहिनी का स्वयंवर हो रहा था। नारद विश्वमोहिनी के सौंदर्य से मोहित होकर उसके स्वयंवर में जा पहुंचे। श्री हरि से यह वरदान लेकर कि उनका रूप नारद को मिल जाए।
स्वयंवर में शिव के गणों ने नारद का मजाक उड़ाया। विश्वमोहिनी ने भगवान विष्णु का वरण किया। तब नारद को पता चला कि श्रीहरि का अर्थ बंदर भी होता है और उन्हें भगवान ने बंदर का रूप दे दिया है। तब नारद ने विष्णुजी से कहा कि तुमने मेरे साथ धोखा किया है। इसलिए मैं तुम्हें तीन श्राप देता हूं। पहला कि तुम मनुष्य के रूप में जन्म लोगे। दूसरा तुमने हमें स्त्री वियोग दिया, इसलिए तुम्हें भी स्त्री वियोग सहकर दुखी होना पड़ेगा और तीसरा श्राप यह कि जिस तरह हमें बंदर का रूप दिया है, इसलिए बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे और उनका सहारा लेना पड़ेगा।

