शिवाला तिराहा। पूरे देश में सर्द हवाओं चल रही है और मानसून दिन प्रतिदिन बदल रहा है 60 साल के गया प्रसाद अपने गांव के सूखे तालाब के पास बैठे उसे टकटकी लगाए देख रहे थे। जब हमने उनसे गांव के तालाब के बारे में पूछा तो ढेर सारी पुरानी यादें उनके जहन में खलबली मचाने लगीं।
वह याद करते हुए कहते हैं, “गर्मी के महीनों की चिलचिलाती धूप में खेलने के बाद मैं और मेरे दोस्त तालाब के हरे भरे किनारे के पास आराम करने बैठ जाया करते थे।” उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के बरूई में रहने वाले गया प्रसाद वर्मा ने सुपर फ़ास्ट टाइम्स न्यूज पेपर को बताया, मुझे अब भी तालाब के पास वह सुकून देने वाली ठंडी हवा याद है। तालाब के आसपास खूब हरियाली हुआ करती थी और हर समय वहां फूल खिले रहते थे। हम तितलियों का पीछा करते और ”
जिस तालाब की खूबसूरती का जिक्र वर्मा जी कर रहे हैं फिलहाल वहां कचरे का ढेर है। इसके चारों ओर कहीं कोई हरियाली नहीं है। कूड़े और बदबू से पटे तालाब की इस सूखी जमीन को गांव के बच्चे शायद ही कभी देखने आते हों।
उन्होंने कहा, “लोग तालाब के पानी का इस्तेमाल नहीं करते हैं। पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब उनके पास हैंडपंप और बोरवेल है। अब तो बस इसमें कूड़ा डाला जाता है। तालाब के साथ-साथ हमारे गांव की खूबसूरती भी मर गई।’
तालाब जो कभी देश के ग्रामीण परिदृश्य की खूबसूरती का हिस्सा हुआ करते थे, वे वर्मा जी के बरूई गांव के तालाब की तरह तेजी से गायब हो रहे हैं। उनमें से सैकड़ों हजारों पहले ही दम तोड़ चुके हैं। उनकी सूखी जमीन पर इमारतें, भवन, खेल के मैदान या कूड़े के ढेर खड़े हैं और जो बचे हैं उनकी हालत भी ठीक नहीं है।
लेकिन क्यों गायब हो रहे हैं तालाब?
जो तालाब ग्रामीण जीवन का हिस्सा हुआ करते थे, जो पूजनीय और संरक्षित थे, कैसे और क्यों कम होते चले गए? यह समझने के लिए सुपर फ़ास्ट टाइम्स ने मेघ पाइन अभियान के संस्थापक एकलव्य प्रसाद से संपर्क किया। मेघ पाइन एक चैरिटेबल ट्रस्ट है जो जल सुरक्षा और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनरुद्धार के मुद्दे पर काम करता है।
गया प्रसाद ने बताया के सालों से नीति निर्माताओं का दृष्टिकोण ग्रामीण क्षेत्रों में पीने योग्य पानी के पारंपरिक स्रोतों- कुओं और तालाबों से दूर जाने का रहा है। उनके संदेशों में कहीं न कहीं ये बात छिपी होती है कि तालाब जैसे सदियों पुराने पारंपरिक जल स्रोत अस्वच्छ हैं।”
उन्होंने कहा कि ग्रामीण लोगों तक ये संदेश पहुंचा और उन्होंने इसे सही मान लिया। वे तालाब के पानी को गंदा मानने लगे और सतही जल स्रोतों का उपयोग करने के बजाय भूजल निकालने के लिए हैंडपंप और अन्य तकनीकों की तरफ जाना उन्हें सही लगा।
गया प्रसाद ने बताया, “धीरे-धीरे ये तालाब बेमानी हो गए और गाँव के लोंगों के मन में इन जल निकायों के लिए जो सम्मान था वो दूर चला गया। इनका अतिक्रमण शुरू हो गया। लोगों ने इन तालाबों में कचरा डालना शुरू कर दिया। इन तालाबों की स्वच्छता और अस्तित्व की गारंटी देने वाली संस्कृति गायब हो गई।”
लखीमपुर खीरी जिले के बरूई गाँव की रहने वाले समाज सेवी 22 साल के प्रांशु वर्मा ने बताया कि कोई समय था जब गाँव में तालाब के किनारे कितने त्यौहार मनाए जाते थे। तेजी से गायब होते तालाब ग्रामीण संस्कृति के लिए खतरा हैं।
उन्होंने कहा, “हम तिजिया नामक एक त्योहार मनाते हैं जिसमें हम तालाब पर जाकर अपने भाइयों के लिए प्रार्थना करते हैं। पहले हम तालाब के पानी का इस्तेमाल पूजा-पाठ में किया करते थे। लेकिन अब तो इनमें पानी ही काफी कम है और जो है वो इतना गंदा कि उसे पूजा में इस्तेमाल ही नहीं किया जा सकता।”
वह आगे कहते हैं, “हम तालाब पर अनुष्ठान करने के लिए अपने घरों से पानी ले जाते हैं। लेकिन क्या तालाब हमारी अगली पीढ़ी के लिए तिजिया उत्सव मनाने के लिए बचे रह पाएंगे।”
मौजूदा ग्रामीण ढांचे में तालाबों के लिए बहुत कम जगह बची है।
प्रांशु वर्मा ने कहा, “पुराने समय में यह कहा जाता था कि खेत तालाब से पानी पीता है और इंसान कुएं से।”
उन्होंने कहा, “लेकिन अब लगभग हर गांव में सिंचाई और पीने के पानी के लिए नल और बोरवेल लग गए हैं। ऐसे में सिर्फ प्रशासनिक निर्णय लेना और तालाबों के पुनर्जीवित होने की उम्मीद करना बेमानी है। हमें यह महसूस करने की जरूरत है कि ग्रामीण जीवन शैली में अब तालाबों को बनाए रखना संभव नहीं है।” गया प्रसाद वर्मा की चिंताओं को प्रांशु वर्मा ने जायज माना और कहा कि तालाबों की संख्या और स्थिति में गिरावट मानव सभ्यता में गिरावट के साथ ही जुड़ी हुई है।
