आज हम बात करें आमजन और पत्रकारों के बीच का फासला तो शायद आमजन के जुबान पर एक ही शब्द होगा जिसको कहते हैं गोदी मीडिया।
जब जनता हार थक कर जब उसकी समस्याओं का समाधान कहीं नहीं होता था तो मीडिया का सहारा लेता था और मीडिया के माध्यम से अपनी बातों को शासन प्रशासन तक पहुंचा कर न्याय की एक किरण पाने का पूर्ण विश्वास रखता था।
और ऐसा होता भी था जब कोई पत्रकार किसी पीड़ित व्यक्ति का इंटरव्यू लेकर खबर को रिलीज करता था तो तत्काल शासन-प्रशासन उस पर जांच लगाकर पीड़ित को हर संभव प्रयास करके न्याय भी दिलाता था।
लेकिन क्या आज ऐसा हो रहा है अगर ऐसा हो रहा है तो फिर गोदी मीडिया, दलाल मीडिया, बिकाऊ मीडिया आम जनता क्यों कह रही है।
आइए हम बताते हैं आपको अगर आपको पता नहीं है तो समझ लीजिए हमारी बात को।
आज के युग में एक पत्रकार कहीं ना कहीं शिफ्ट हो चुका है।
कुछ पत्रकार तो नेताओं के संरक्षण में हैं जो नेता कहेंगे वही वह छापेंगे।
कुछ अधिकारी के ऑफिस में बैठकर चाटुकारिता करते हैं अधिकारी के इशारों पर अपने कलम को चलाते हैं।
तो कुछ पत्रकार थाने और चौकियों में थाना प्रभारी चौकी प्रभारी के साथ बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हैं।
तो कुछ पत्रकार विज्ञापन के लिए पूंजीपतियों के आगे पीछे घूम रहे हैं।
अब बारी है आम जनता की अब कितने पत्रकार पब्लिक के साथ बैठकर उनकी जन समस्याओं को सुनते हैं जन समस्याओं पर लिखते हैं पीड़ित परिवार के लिए शासन प्रशासन से सवाल करते हैं।
शायद 10 परसेंट से भी कम होंगे जो चौक चौराहे गली मोहल्ले गांव में जाकर गरीब कमजोर जनता से उनकी समस्याओं को सुनते हैं और खबरों को रिलीज करके उनकी बातों को शासन प्रशासन तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
निष्पक्ष खबरों को लिखते हैं जरूरत पड़ने पर थाना प्रभारी से लेकर अधिकारी तक बड़े नेता मंत्रियों तक पहुंच कर उनसे सवाल भी करते हैं।
परंतु ऐसे पत्रकारों पर भी जनता भरोसा करते हुए कतराती है कारण उसे वही दिखाई पड़ता है जो अधिक संख्या में हाईलाइट है।
ऐसे पत्रकारों पर हमला भी होता है धमकियां भी दी जाती हैं झूठा मुकदमा पंजीकृत करके सलाखों के पीछे भी डाल दिया जाता है।
कारण यही है कि धीरे-धीरे निष्पक्ष निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले पत्रकारों की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है और जनता का विश्वास मीडिया से उठता जा रहा है इसीलिए गोदी मीडिया के नामों से लोग पत्रकारों का नामांकरण करते हैं। तमाम ऐसे थाने चौकियां हैं कि कुछ पत्रकार सिर्फ अपनी पत्रकारिता थाने और चौकी में चाय की चुस्की के साथ ही करते हैं।
थाने पर चौकी पर जाना गलत बात नहीं है लेकिन जब किसी पीड़ित के लिए सवाल करना हो जानकारी हासिल करनी हो जब कोई काम हो तब थाने चौकी पर जाकर अपनी बातों को साझा करें।
एक निरीक्षक एक थाना प्रभारी एक कांस्टेबल इतना आसानी से कैसे पत्रकारों से गाली गलौज कर लेते हैं मारपीट कर लेते हैं तू तू मैं मैं हो जाती है यही कारण है कि कुछ पत्रकार थाना चौकी में बैठकर चटुकारिता करते हैं चाय पीते हैं बंद मक्खन खाते हैं सिगरेट का धुआं उड़ाते हैं गुटखा खाते हैं तो जब कोई दूसरा पत्रकार किसी माइनस पॉइंट में सवाल करेगा तो ऐसे मे दरोगा थाना प्रभारी या कांस्टेबल उसी पत्रकार को सोचेगा जो उनके साथ बैठकर चाय की चुस्कियां लेता है।
बड़े-बड़े नेता मंत्री विधायक के गुर्गे पत्रकारों पर हमला क्यों करवा देते हैं इसीलिए यह पत्रकार नेताजी का चमचागिरी कर रहा है और दूसरा पत्रकार उनके माइनस पॉइंट को उजागर कर रहा है।
सभी पत्रकारों को विशेष ध्यान देकर अपनी गरिमा को बचाने के लिए किसी की चाटुकारिता ना करके चमचागिरी ना करके जन समस्याओं पर पत्रकारिता करें निष्पक्ष लिखें निष्पक्ष सवाल करें और नेता मंत्री पूंजीजी पति अधिकारी थाना प्रभारी चौकी प्रभारी को समय देने से अच्छा आम जनता के बीच सक्रिय होकर जनसमस्याओं को लेकर पत्रकारिता करें तो इससे पत्रकारों का मान सम्मान भी बचेगा देश का भला भी होगा।
पत्रकारों के दुश्मन नेता, मंत्री विधायक, सांसद, अधिकारी थाना, प्रभारी चौकी, प्रभारी पूंजीपति भी नहीं है इनसे मिलने में कोई बुराई नहीं है लेकिन मतलब से काम के लिए इनके पास बैठने का मतलब यह नहीं कि खबरों को छुपाने का।
किसी नेता को किसी मंत्री को किसी विधायक को किसी सांसद को किसी अधिकारी को किसी थाना प्रभारी को किसी चौकी प्रभारी को किसी पूंजीपति को कोई समस्या होती है तो उस पर भी हम पत्रकारों को उनकी समस्याओं को दिखाना चाहिए उनका साथ देना चाहिए।
परंतु चंद पैसों के लिए अपनी कलम को रखैल नहीं बनाना चाहिए।
हमें पता है इस लेख से कुछ लोगों के दिल पर चोट जरूर लगा होगा लेकिन चोट उन्ही को लगा होगा जो अपने कर्तव्य का पालन ना करके अपनी गरिमा को गिरा रहे हैं इसलिए मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि जो देश का नहीं जो समाज का नहीं वह हमारा कभी नहीं हो सकता।
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February 11, 2023
