भारतीय संविधान के निर्माता, आधुनिक भारत के शिल्पकार एवं शोषितों वंचितों व महिलाओं के मुक्तिदाता, ज्ञान के प्रतीक, विश्व रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने अपनी ऐतिहासिक कृति “Annihilation of Caste” में जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए अंतरजातीय विवाह को सबसे प्रभावशाली और आवश्यक हथियार बताया। इसी विचार को संतराम बीए प्रजापति द्वारा स्थापित ‘जाति-पाति तोड़क मंडल’ ने भी प्रमुखता से अपनाया था।
भारतीय संविधान की मूल भावना भी इसी दिशा में स्पष्ट रूप से संकेत करती है:
अनुच्छेद 14 : सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 15(1) व 15(3) : जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर किसी प्रकार के भेदभाव को निषिद्ध करता है।
अनुच्छेद 21 : प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें अपनी मर्जी से विवाह करने की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है।
इसी संवैधानिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु विशेष विवाह अधिनियम, 1954, लागू किया गया, जिससे विभिन्न जातियों और धर्मों के व्यक्ति आपसी सहमति से विवाह कर सकें।
अतः यह स्पष्ट है कि संविधान किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद के जीवनसाथी से विवाह करने का पूर्ण अधिकार देता है—चाहे वह किसी भी जाति या धर्म से संबंधित क्यों न हो। यह न केवल एक व्यक्तिगत अधिकार है, बल्कि सामाजिक समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक और नैतिक कदम भी है।
परंतु खेद का विषय है कि वर्तमान समय में न्यायपालिका में व्याप्त भाई-भतीजावाद और कॉलेजियम प्रणाली के चलते कुछ स्वघोषित “मिलार्ड्स” संविधान की मूल भावना के विरुद्ध जाकर अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें हतोत्साहित कर रहे हैं।
जबकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि “अंतरजातीय विवाह सामाजिक प्रगति का प्रतीक है। वयस्क नागरिकों को अपनी पसंद से विवाह करने का मौलिक अधिकार है।” अनेक राज्य सरकारें इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देने हेतु विशेष योजनाएं भी चला रही हैं।
इसके बावजूद समाज के यथास्थितिवादी तत्व और कुछ न्यायिक टिप्पणियाँ समय-समय पर इस संवैधानिक अधिकार का विरोध करती रही हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी भी इसी प्रवृत्ति का चिंताजनक उदाहरण है।

